अगर दिल टूट जाए तो मरम्मत हो नहीं पाती,
दोबारा प्यार होता है, मोहब्बत हो नहीं पाती!
कमी यारों की है, थोड़ा उमर का भी तक़ाज़ा है,
वही मौसम है पर वैसी तबीयत हो नहीं पाती!
ये क़ैद-ए-उम्र है जिसको ज़माना इश्क़ कहता है,
सज़ा पूरी नहीं होती, ज़मानत हो नहीं पाती!
सुना है दिल के बारे में, ख़ुदा का दूसरा घर है,
तो क्यूँ दिल टूट जाने से क़यामत हो नहीं पाती!
ज़ियादा कस के थामो तो भी चीज़ें टूट जाती हैं,
ज़ियादा ध्यान रखने से हिफ़ाज़त हो नहीं पाती!
तुम्हारे राज़ ग़ज़लों में ज़माने को बता देते,
मगर हमसे अमानत में ख़यानत हो नहीं पाती!
यूँही ‘अल्फ़ाज़’ ने तुमसे वफ़ादारी नहीं छोड़ी,
ख़ुदा पर न यक़ीं हो तो इबादत हो नहीं पाती!
||| अल्फ़ाज़ |||

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