देखते हैं सफ़र किस ठिकाने चले,
आज अपना पता हम लगाने चले!
हम तलातुम की नज़रों में
चुभने लगे,
दो किनारों को जब भी मिलाने
चले!
अपनी जुर्अत को हम आज़माने
चले,
आईने से निगाहें मिलाने चले!
जाने कितने ही सच हमने झुठला
दिये,
झूठ जब एक ज़रा सा छुपाने
चले!
कैसे कैसे न हमपे निशाने चले,
आज हम जो ज़रा मुस्कुराने
चले!
आज फिर नए सिरे से वो याद आ
गया,
आज फिर नए सिरे से भुलाने
चले!
हाथ अक्सर जलाकर चले आए हैं,
आग बस्ती की जब भी बुझाने
चले!
कितना बिकना पड़ेगा, पता चल गया,
आज ‘अल्फ़ाज़’ रोटी कमाने चले!
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अल्फ़ाज़ lll
तलातुम = तूफ़ान,
Tumlet
जुर्अत = दुःसाहस,
Courage, Valour

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