जब सफ़र में कोई शाम ढल जाती है!
याद बन के शमा दिल में जल जाती है!
जाने क्या बात है तेरे दीदार में,
मेरी तबियत ज़रा सी संभल जाती है!
जोर क़ुदरत पे इंसाँ का चलता नहीं,
रेत मुट्ठी से आख़िर फिसल जाती है!
तेरे जाने से हम ऐसे बेजान हैं,
रूह जैसे बदन से निकल जाती है!
झूठ की गोलियां सबको मीठी लगीं,
बात सच्ची ज़माने को खल जाती है!
हार मत मानिए, ये तो हालात
हैं,
हौसला हो तो क़िस्मत बदल जाती है!
अपनी ज़िद पे जो ‘अल्फ़ाज़’ क़ायम रहे,
वो शमा आँधियों में भी जल जाती है!
अल्फ़ाज़...

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