शहर...


इस भागते शहर में ठहरा है हर कोई,

है भीड़ दो जहाँ की, तन्हा है हर कोई!

 

जीना नहीं इसे एक जद्द-ओ-जहद कहो,

सबको यही वहम है, जिन्दा है हर कोई!

 

ढोता है ख़्वाहिशों की दिन-रात बेड़ियाँ,

अपनी ही क़ैद का ख़ुद पिंजरा है हर कोई!

 

देता नहीं किसीको जीने की एक वजह,

जीने की सौ नसीहत देता है हर कोई!

 

बस वक़्त पे कोई भी अपना नहीं मिला,

वैसे तो इस शहर में अपना है हर कोई!

 

लुटती है इस शहर में दिन-रात आबरू,

अँधा है ये शहर और बहरा है हर कोई!

 

यूँ तो पता हैं सबको अपनी बुराइयाँ,

अपनी नज़र में फिर भी अच्छा है हर कोई!

 

‘अल्फ़ाज़’ छोड़िए भी बातें उसूल की,

क़ीमत सही मिले तो बिकता है हर कोई!

अल्फ़ाज़...

 जद्द-ओ-जहद (Jadd-O-Jahad) = खींचतान, Struggle, Tug Of War

 उसूल (Usool) = सिद्धांत, नियम, Fundamentals, Principles

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