ऐसे
हालात ही कुछ खड़े हो गए,
वक़्त
से पहले ही हम बड़े हो गए!
ख़ुद
से हुशियार रहना ज़रूरी लगा,
सामने
जब मेरे आईने हो गए!
एक
इंसान जिसमें बुराई न हो,
गुमशुदा
ढूँढते-ढूँढते हो गए!
आप
जैसों को कहती है दुनिया भला?
फिर
तो अच्छा हुआ हम बुरे हो गए!
बात
से ध्यान सबका भटकना ही था,
बात
के जब कई माएने हो गए!
जानते
हैं, हमारी सुनोगे नहीं,
हम
भी ख़ामोश बस इसलिए हो गए!
रोज़
हैरान होता हूँ ये सोच कर,
साल
कितने ही तुमसे मिले हो गए!
हाल
‘अल्फ़ाज़’ के दिल का ऐसा है कि,
एक
घर पे कई ज़लज़ले हो गए!
||| अल्फ़ाज़ |||

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